Moral Stories In Hindi - मोरल स्टोरीज इन हिंदी

आज के इस लेख में हम आपके लिए Moral Stories In Hindi लिखी है। यहाँ पर हमने बच्चो एवं अन्य के लिए 30 नैतिक कहानियाँ लिखी है। यदि आप भी Moral Stories ढूंढ रहे है तो यहाँ पर पढ़े नई शिक्षप्रद कहानियाँ हिंदी में। 

Moral Stories In Hindi
Moral Stories In Hindi 

यह कहानियाँ बहुत ही रोचक है। जिनको पढ़कर आपको और बच्चों को बहुत आनंद आएगा। इनमे कुछ New moral short stories in Hindi 2022, दी गयी है। जिससे आपको नयापन का अनुभव हो। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़ कर बोर हो गए है तो। यहाँ पर हम आपको सबसे अच्छी 30 Moral stories in Hindi for kids दे रहे है।

1. Moral Stories In Hindi - मेहनत की कमाई 

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एक अमीर बाप का बेटा आलसी और निर्लज्ज था। एक दिन उसके पिता ने उसे कुछ कमाकर लाने के लिए कहा। लड़का अपनी माँ के पास मिन्नते कर एक रूपये का सिक्का ले आया और अपने पिता को सौप दिया। पिताजी सब कुछ समझ गए। 

उसने बेटे को वह सिक्का कुएँ में डालने को कहा लड़के ने झट से सिक्के को कुएँ में फेंक दिया। अगले दिन पिता ने लड़के से फिर कमाकर लाने के लिए कहा। अबकी बार लड़के ने अपनी बहन से एक रुपया लाकर पिताजी को सौप दिया पिताजी ने उसे भी कुएँ में फिकवा दिया। अगले दिन पिता ने माँ और बेटी को घर से बाहर भेज दिया, और लड़के से कमाकर लाने की बात कही। बेटा दिनभर घर पर सुस्त बैठा रहा। 

अंत में शाम के समय वह कुछ काम ढूंढने के लिए बाजार गया। वहां पर एक सेठ ने अपना सामान घर पहुंचाने के बदले उसे एक चवन्नी दी। लड़का थक गया था उसके पुरे शरीर में दर्द हो रहा था। रात में घर आकर पिताजी को उसने चवन्नी सौप दी। 

पिता ने फिर उसे कुएँ में डालने की बात कही। इस पर लड़के को गुस्सा आ गया उसने कहा पिताजी यह मेरी मेहनत की कमाई है। अनुभवी पिता समझ गया था कि बेटे को मेहनत की कमाई का मतलब समझ आ गया था। अगले ही दिन पिता ने अपना सारा कारोबार बेटे को सौप दिया। उस दिन बेटा और पिताजी बहुत खुश थे। 

Moral Of The Story 

माँ-बाप हमेशा अपने बच्चो को सही शिक्षा देते है उनकी आज्ञा का पालन पूरी ईमानदारी से करना उनके लिए नहीं हमारे भविष्य के लिए फायदेमंद होता है इसलिए हमेशा अपने माता-पिता कहना मानना चाहिए। 

2. Moral Stories In Hindi  - अनोखी सूझ

पुराने जमाने में देवताओ और दानवो के बीच अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए युद्ध होता रहता था। एक बार देवता और दानव मिलकर ब्रह्माजी के पास गए और पूछा की हममे से बुद्धि में कौन बड़ा है ? ब्रह्माजी ने दोनों  को भोजन पर बुलाया। 

देवता और दानवो को अलग-अलग कमरों में बैठाकर लड्डुओं के थाल भिजवा दिए और शर्त लगा दी कि बिना कोहनी मोड़े भोजन करना है। देवता आमने-सामने बैठ गए और लड्डू उठाकर एक-दूसरे के मुँह में देने लगे। इस प्रकार उन्होंने शांति पूर्वक भोजन कर लिया। 

वही दानवो ने लड्डू उछाल-उछाल कर खाना शुरू किया। कुछ लड्डू उनके मुँह में गए और कुछ कमरे में फेल गए। कमरे में शोर-शराबा और गन्दगी फेल गयी। भोजन के बाद ब्रह्माजी ने कहा कि देवताओ ने सहयोग की भावनाओ से काम किया जबकि दानवो ने न तो खुद खाया और न ही दुसरो को खाने दिया। इस प्रकार देवताओ को बुद्धि में श्रेष्ठ घोषित किया गया। 

Moral Of The Story

कुछ कार्य ऐसे होते है जिन्हे करना आसान होता है परन्तु सही सूझ-बुझ ना होने से हम वो कार्य नहीं कर पाते है। ऐसे कार्य करने का मौका मिले तो सूझ-बुझ का प्रयोग करना चाहिए।  

3.Moral Stories In Hindi - खरगोश और कछुआ 

Moral Stories In Hindi for kids

एक जंगल था जिसमे एक खरगोश और कछुआ रहता था। खरगोश अपनी दौड़ के ऊपर घमंड में रहता था। बेचारा कछुआ साधारण सोच वाला था परन्तु जिंदगी में खुश था। एक दिन खरगोश और कछुआ की मुलाकात हुयी। खरगोश ने कछुए से दौड़ लगाने की पेशकश की। 

कछुए ने खरगोश को दौड़ के लिए हामी भर दी। दोनों के मध्य शर्त लगी की जो भी सबसे पहले तालाब के पास पहुंचेगा वो विजेता होगा। इस प्रकार खरगोश तेजी से दौड़ने लगा वही कछुआ धीरे-धीरे दौड़ने लगा। 

खरगोश दौड़ता हुआ बहुत दूर तक चला गया और एक पेड़ के निचे बैठकर सोचने लगा की में कुछ समय के लिए आराम कर लेता हु कछुआ तो अभी बहुत पीछे है। इस प्रकार आराम करते हुए खरगोश की आँख लग गयी। कछुआ चलता हुआ तालाब के पास जा पंहुचा। 

कुछ समय बाद खरगोश की आँख खुली खरगोश तेज गति से दौड़ता हुआ तालाब के पास पंहुचा। वहां पर कछुए को देखकर खरगोश दुखी हो गया और हार गया। कछुआ इस जीत से बहुत खुश हुआ और वहां से जाते हुए खरगोश से बोला क्यों रे घमंडी इतना तेज दौड़ा फिर भी हार गया। घमंडी खरगोश नजरे चुराकर भाग गया।

Moral Of The Story

हर आदमी के पास अपना-अपना हुनर होता है पर अपने हुनर पर जो भी घमंड करता हु उसका परिणाम घमंडी खरगोश जैसा होता है। इस कहानी से हमे सीख मिलती है की हमे अपने काम अधूरे नहीं रखने चाहिए पढाई करनी है तो पुरे साल कछुए की तरह धीरे-धीरे करो खरगोश की तरह तेज गति से मत पढ़ो तभी टॉपर बनोगे। 

4. Short Moral Stories In Hindi - कौआ और मंगर 

एक घना जंगल था उसमे एक कौआ रहता था। जंगल के अंदर ही एक तालाब था जिसमे एक मंगर रहता था। एक दिन कौआ तालाब के पास बैठकर फल खा रहा था तभी मंगर बाहर आया और बोला क्या तुम मुझे भी फल खाने के लिए दोगे तो कौए ने कहा हां भाई तुझे में फल खाने के लिए दूंगा परन्तु तुम्हे भी मुझे खाने के लिए मछली देनी होगी और मुझसे दोस्ती करनी पड़ेगी। इस प्रकार दोनों के मध्य दोस्ती हो गयी। 

रोजाना दोनों तालाब के किनारे बाते करते हुए फल और मछलियाँ खाते रहे। दोनों की दोस्ती मजबूत हो गयी। एक दिन मंगर की पत्नी ने मंगर से कहा की मुझे किसी का दिल खाना है तो मंगर ने कहा दिल कहा से लाउ तो पत्नी ने कहा आप जब तक मेरे लिए दिल नहीं लाओगे में तब तक कुछ नहीं खाउंगी। 

मंगर उदास हो गया और सोचने लगा में दिल कहा से लाऊ। दूसरे दिन वो अपने मित्र कोए से मिला और उसको भहला-फुसला कर कहने लगा कि भाई हमारी दोस्ती को कितने दिन हो गए परन्तु मेने तुझे अपना घर नहीं दिखाया। तो कौआ बोल मंगर तेरा घर तो पानी में है में वहां कैसे जाऊंगा। मंगर ने कहा मेरी पीठ पर बेठ जा में ले चलूँगा। 

कौआ मंगर की पीठ पर बैठ गया। तालाब के अंदर पहुंचने पर मंगर ने पत्नी की सारी बात कोए को बताई। कौआ सोचने लगा अरे यार इसकी पत्नी तो मुझे खा जाएगी अब में क्या करू। 

कोए ने मंगर से कहा अरे दोस्त तेरी पत्नी को तो दिल खाना है  मे तो दिल को पेड़ पर ही छोड़ आया। मंगर ने कहा चलो वापस चलते है दिल को लेकर आते है। 

इस प्रकार कौआ फिर से बाहर आ गया और उड़कर पेड़ पर बैठ गया। कोए ने मंगर को ठेंगा दिखाके कहा क्यों रे मुझे अपनी पत्नी का भोजन बनाना चाहता था। अरे मुर्ख मंगर दिल अंदर रहता है पेड़ पर नहीं आज से तेरी मेरी दोस्ती खत्म। यह कहकर कौआ उड़ गया। मंगर उदास होकर सोचने लगा मेरा दोस्त भी गया और मेरी पत्नी भी।

Moral Of The Story

दोस्ती करके दोस्ती में धोखा नहीं करना चाहिए वरना मंगर की तरह ना घर के रहोगे ना घाट के।    

5. Moral Stories In Hindi For Kids - दयावान सेठ और लालची राजू 

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एक छोटा सा गांव था उसमे एक राजू नाम का लालची बालक रहता था। राजू के माता-पिता बूढ़े हो गए थे। राजू के पास एक भैंस थी उसी से उनका घर चलता था। राजू रोजाना भैंस चराने जाता था। वो अपनी भैंस को हमेशा फसलों में चराता था उसकी भैंस फसलें खा-खा के मोटी-तगड़ी हो गयी थी।

गांव में एक सेठ भी रहता था उसके पास भी एक भैंस थी। उसने राजू की भैंस को देखकर सोचा की क्यों ना में इसे अपनी भैंस चराने के लिए महीने के हिसाब से बांध लू। सेठ ने राजू को बुलाकर कहा की राजू क्या तुम मेरी भैंस भी चरा सकते हूँ में तुम्हे महीने के हिसाब से पैसे दूंगा। 

राजू ने भैंस चराने के लिए हामी भर दी। अब राजू रोजाना सेठ की भैंस को भी चराने के लिए ले जाने लगा। परन्तु राजू अपनी भेस को तो फसलों में खुली छोड़ के चराता परन्तु सेठ की भैंस को नहीं। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा फलस्वरूप सेठ जी की भैंस पतली और थकी हुयी लगने लगी। 

सेठ ने राजू से पूछा राजू मेरी भैंस इतनी कमजोर कैसे हो गयी तुम्हारी भैंस तो मोटी हो रही है। राजू ने कहा सेठ जी आपकी भैंस शायद चरती कम है। सेठ उसकी बात से असहमत था। सेठ ने सचाई पता लगाने की सोची। 

सेठ एक दिन राजू का पीछा करता हुआ गया वहां जाकर उसने सारी बात जान ली। सेठ गुस्से में जाकर बोला राजू तुम ऐसे चराते हो मेरी भैंस को। अब में तुम्हे कोई पैसा नहीं देने वाला। सेठ अपनी भैंस को लेकर घर आ गया। 

Moral Of The Story

लालच में इंसान अँधा हो जाता है लालची बनोगे तो परिणाम भुगतने पड़ सकते है तभी तो कहा गया लालच बुरी भला है। 

6. Moral Of Stories In Hindi For Class 1 - हंस और मछलियाँ 

एक छोटा सा तालाब था उसमे कुछ मछलियाँ थी पास में ही एक पेड़ पर हंस भी रहता था। मछलियाँ और हंस के मध्य अच्छी दोस्ती थी। गर्मी के दिन थे तालाब धीरे धीरे सोख रहा था। मछलियाँ अपने जीवन को लेकर परेशान थी कि अब हमारा जीवन समाप्त होने वाला है। 

उस तालाब में एक बड़ा केकड़ा भी रहता था। सभी मछलियों की इस परेशानी का फायदा उठाने के लिए लालची हंस ने एक योजना बनाई और मछलियों के पास जाकर बोला देखो मछलियों यह तालाब सूखने वाला है पास में ही एक बड़ा तालाब है में तुम्हे वहां पर ले जाऊंगा अगर तुम सब चाहो तो। 

बेचारी मछलियां लालची हंस के जाल में फंस चुकी थी। हंस अपनी चोंच में एक लकड़ी का टुकड़ा पकड़ लेता और दो मछलियाँ उस टुकड़े को मुँह से पकड़ लेती। हंस उड़कर उन मछलियों को एक पत्थर पर ले जाकर खा जाता था। 

इस प्रकार वो रोजाना इस उपाय से मछलियों को खा रहा था। एक दिन केकड़े ने हंस से कहा आज मुझे ले चलो हंस तो हंस ने सोचा अरे यार रोजाना मछलियाँ खा-खा के बोर हो गया आज केकड़ा खाऊंगा। हंस ने केकड़े को लकड़ी पकड़ाकर उड़ गया। 

अब वो पत्थर पर उतरने वाला था परन्तु केकड़े ने मछलियों के कंकाल पत्थर पर देख लिए थे। केकड़े ने देर ना करते हुए हंस की गर्दन पर अपने नाखून गाड़ दिए और हंस को मार दिया। केकड़ा धीरे-धीरे रेंगते हुए तालाब में पहुंचा और हंस की सारी चाल मछलियों को बताई। मछलियाँ यह सुनकर बहुत उदास हुयी। 

Moral Of The Story 

दुसरो को अपने जाल में फंसाने से पहले अपने बारे में सोचना जरुरी है वरना हंस की तरह बेमौत मारे जाओगे। 

7. Moral Stories In Hindi For Class 2 - जीनु और चार चोर 

एक छोटा सा कस्बा था उसमे जीनु नाम का एक होशियार बालक रहता था। जीनु के माता-पिता गरीब थे। एक रात जीनु अपने खेत पर जा रहा था। परन्तु रास्ते से कुछ आवाजे उसे सुनाई दी तो वो झट से बरगद के पेड़ पर चढ़ गया। 

तभी उसने देखा की चार चोर चोरी का माल लेकर बरगद की और आ रहे थे। चारो चोर बरगद के निचे आकर बेठ गए और चोरी के माल को चार हिस्सों में बांटने की बात करने लगे। तभी 

पहला चोर : अरे यार मेने सुना है इस बरगद के पास भूत रहते है। 

दूसरा चोर : हां यार तू सच कह रहा मेरी माँ ने मुझे यहाँ के बारे बताया था। 

तीसरा चोर : तो फिर जल्दी-जल्दी बाँटते है। 

चौथा चोर : हां जल्दी करो कही भूत आ गया तो में तो भाग जाऊंगा। 

इन बातो को सुनकर जीनु को एक तरकीब सूझी उसने बरगद से एक पुरानी मोती लकड़ी तोड़ी और उसका बरगद से निचे गिराने के लिए छोड़ दिया। वो लकड़ी बड़-बड़ करती हुयी निचे आने लगी। 

लकड़ी की आवाज को सुनकर चार चोर वहां से फरार हो गए और चोरी का माल वही पर छोड़ गए। जीनु बरगद से उतरकर सोना-चांदी को लेकर घर आ गया। इस प्रकार उसके घर वाले हमेशा के लिए खुश हो गए और कहने लगे वाह रे बेटे जीनु तूने तो कमाल कर दिया। 

Moral Of The Story  

यह कहानी हमे सन्देश देती है की ऐसा मौका अगर जिंदगी में मिले तो उससे चूको मत। अन्धविश्वाश की दुनिया से डरो मत यह सब मन की भावनाये और कुछ नहीं। 

8. Moral Stories In Hindi For Class 9 - किसान और दो बेटे 

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एक गांव था उसमे एक किसान रहता था किसान के दो बेटे थे पहले का नाम रामु और दूसरे का नाम श्यामू था। किसान अब बूढ़ा हो गया था। किसान कुछ दिनों से लगातार बीमार रहने लगा था। दोनों बेटे किसान की सेवा में लगे रहे। 

किसान को लगने लगा की शायद अब में मरने वाला हु तो उसने दोनों बेटो को अकेले में मिलने के लिए कहा। दोनों बेटे किसान के पास गए किसान ने दोनों बेटो को कहा मेरे मरने के बाद अपने खेत के किनारे पर मेने दो मटके गाड़ रखे है उन दोनों में से एक-एक ले लेना और लड़ना झगड़ना मत। एक-दो दिन बाद ही किसान की मृत्यु हो गयी। 

किसान के बारह दिन निकलने के बाद दोनों भाई गांव के पंचो सहित खेत के किनारे चले गए। खेत के किनारे पर खुदाई करने से उन्हें दो मटके मिले। दोनों ने एक-एक मटका ले लिया। रामु के मटके में सोना-चांदी था जबकि श्यामू के मटके में मिटटी। रामु और श्यामू पंचो सहित राजा के दरबार में पहुंच गए। उन्होंने राजा को सारी बात बताई। 

राजा ने हँसते हुए कहा की श्यामू तुम्हारे मटके में मिटटी इस बात की और संकेत करती है की तुम्हे अपने पिता की सारी जमीन मिलेगी। 

दोनों भाई खुशी-खुशी घर आ गए। 

Moral Of The Story

दोस्तों हमे इस कहानी से सीख मिलतीं है की हमे हमेशा मिल जुलकर किये गए फैसले का समान करना चाहिए। हमेशा परिवार को सयुंक्त बनाये रखने के प्रयास करने चाहिए। जिंदगी सिर्फ एक बार मिली है रिश्तो भी एक बार ही मिले है उन्हें अपनाना और निभाना आपका दायित्व है।  

9. Short Story In Hindi With Moral - एक दौड़ ऐसी भी 

कई साल पहले ओलम्पिक खेलो के दौरान दौड़ होने जा रही थी। सौ मीटर की इस दौड़ में गजब की घटना हुई। नो प्रतिभागी शुरुआत की रेखा पर तैयार खड़े थे। उन सभी को कोई न कोई शारीरिक विकलांगता थी। 

सीटी बजी सभी दौड़ पड़े। बहुत तेज तो नहीं, पर उनमे जितने की होड़ जरूर तेज थी। सभी जितने की उत्सुकता के साथ आगे बढ़े। सभी बस एक छोटे से लड़के को छोड़कर। तभी एक छोटा लड़का ठोकर खाकर लड़खड़ाया फिर गिरा और रो पड़ा। 

उसकी रोने की आवाज सुनकर बाकि प्रतिभागी दौड़ना छोड़ देखने लगे कि क्या हुआ ? फिर एक एक करके सभी प्रतिभागी दौड़ना छोड़ उस लड़के की मदद करने पहुँच गए। सब के सब लोट आये। उसे दोबारा खड़ा किया। उसके आंसू पोंछे, धूल साफ की। 

वह छोटा लड़का के ऐसी बीमारी से ग्रस्त था, जिसमे शरीर के अंगो की बढ़त धीमे होती है और उनमे तालमेल की भी कमी रहती है। इस बीमारी को सामान्यतया डाउन सिंड्रोम कहते है। लड़के की दशा देख एक बच्ची ने उसे अपने गले से लगा लिया और उसे प्यार से चुम लिया यह कहते हुए की इसे अच्छा लगेगा। 

फिर तो सारे बच्चो ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मिलकर दौड़ लगाई और सब के सब अंतिम रेखा तक एक साथ पहुँच गए। सभी दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखने लगे यह सोचते हुए कि सब के सब एक साथ बाजी ( प्रतियोगिता ) जीत चुके थे। 

Moral Of The Story

इनमे से किसी एक स्वर्ण पदक कैसे दिया जा सकता है। निर्णायकों ने सभी को स्वर्ण पदक देकर समस्या का शानदार हल ढूंढ निकाला। सब के सब विजयी इसलिए हुए कि उस दिन दोस्ती का अनोखा दृश्य देख दर्शको की तालियां थमने का नाम नहीं ले रही थी। 

10. Stories For Reading In Hindi - एक मूर्ख कंजूस 

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किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके पास बहुत धन था। कंजूस वह इतना था कि हमेशा बिना नमक के सत्तू खाया करता था। किसी स्वादिष्ट भोजन का स्वाद कैसा होता है यह वह नहीं जानता था। लेकिन एक दिन पता नहीं क्या हुआ, उसने अपनी पत्नी से कहा आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है। 

पत्नी को अचरज तो हुआ लेकिन उसने तुरंत खीर बनाकर तैयार कर दिया। उसका मन भी तो खाने को कर रहा था न। लेकिन उस मुर्ख कंजूस को इस बात का डर था कि कही कोई आ ना जाये इसलिए वो घर के अंदर छिपकर बैठ गया। 

संयोग से तभी उसका मित्र उससे मिलने के लिए आया। उसकी पत्नी से पूछा तुम्हारे पति कहाँ है। पत्नी ने अंदर जाकर अपने पति से कहा, आपका मित्र आपसे मिलने आया है। 

वह कंजूस यह सुनकर घबरा गया। उसने अपनी पत्नी से कहा, में लेट हूँ। तुम मेरे पांव पकड़कर जोर से रोना शुरू कर दो। तुम्हारे रोने की आवाज सुनकर वह अंदर आ जायेगा फिर तुमसे कुछ पूछेगा। तुम कह देना की मेरे पति मर गए। यह सुनकर वह चला जायेगा। उसके जाने के बाद हम दोनों मिलकर खीर खाएंगे। 

पत्नी ने ऐसा ही किया। वह पति के पैर पकड़ कर जोर-जोर से रोने लगी। मित्र ने अंदर आकर पूछा, क्या बात है ? तुम क्यों रो रही हो ? 

रोते-रोते वह बोली अभी थोड़ी देर पहले इन्होने मुझसे खीर बनाने के लिए कहा था। लेकिन मेने जैसे ही खीर बनाई ये मर गए। 

वह मित्र सब कुछ जानता था। समझ गया। यह सब बहाना है। उसे डर था कि में खीर ना खा जाऊ। यह सोचकर वह मित्र भी हाय मित्र हाय मित्र कहकर विलाप करने लगा। उनकी आवाज सुनकर पास पड़ोस के और भी लोग वहां आ गए। सेठ जी की मौत का समाचार सुनकर सब उन्हें श्मशान ले जाने का इंतजाम करने लगे। 

उस समय उसकी पत्नी ने रोते-रोते उसके कान के पास मुँह ले जाकर कहा अब तुम उठ जाओ नहीं तो यह लोग तुम्हे श्मशान ले जायेंगे और जला डालेंगे।कंजूस सेठ ने उसी तरह उत्तर दिया नहीं जब तक मेरा यह मित्र यहाँ से नहीं चला जायेगा तब तक में नहीं उठूंगा। यह मेरी खीर खाना चाहता है। में उसे ऐसा नहीं करने दूंगा। 

वह उसी तरह लेटा रहा। पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने अर्थी तैयार की और श्मशान ले गए। चिता पर रखा लेकिन कंजूस सेठ तब भी नहीं उठा। जब आग उसको जला रही थी तब भी उसने मुख से एक शब्द नहीं निकाला। अंत में वह जलकर राख हो गया। 

Moral of the story - इस प्रकार उस आदर्श कंजूस ने जरा सी खीर के लिए अपने प्राणो का बलिदान कर दिया। इसके मरने के बाद उसके धन को दुसरो ने खूब भोगा। 

11. Stories For Reading In Hindi - तीन मछलियों की हिंदी कहानी 

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एक बहुत सुंदर बन था। उसमे वैसा ही एक सुंदर तालाब था। उस तालाब में तीन मछलियाँ रहती थी। तीनो के स्वभाव अलग-अलग थे। पहली के सामने कोई समस्या आती तो वह तुरंत उसे सुलझाने की कोशिश करती, किसी की राह नहीं देखती थी।

दूसरी मछली भी होशियार थी पर वह तुरंत ही कुछ करने में विश्वाश नहीं करती थी। वह सोचती थी समय पर जैसा होगा वैसा कर लिया जायेगा। अभी से क्यों परेशान हुआ जाए !

तीसरी मछली कुछ भी नहीं सोचती थी। वह तो मानती थी कि जो भगवान को मंजूर होगा, वही होगा ! एक दिन उन्होंने कही मछेरो को जाते देखा। वे आपस में बात कर रहे थे की इस तालाब में बहुत अच्छी मछलियाँ है। उन्हें पकड़ना चाहिए। 

पहली मछली यह सुनते ही जल की बहती धारा के साथ दूसरे तालाब में चली गई।

दूसरी मछली ने भी मछुओं की बाते सुनी और सोचा पहले इन्हे आने दो तब जैसा ठीक होगा वैसा कर लुंगी। सुना तीसरी मछली ने भी लेकिन उसने कोई चिंता नहीं की। जो होना है वह तो होगा ही ! उसे कौन रोक सकता है ?

Moral Of The Story - जैसा की हो सकता था वे मछुए दूसरे दिन ही जाल लेकर आ पहुंचे। दूसरी मछली जाल को देखते ही ऐसे लेटी जैसे मर गई। मछुओं ने उसे देखकर सचमुच मरी हुई समझ ली और उठाकर एक तरफ फेंक दिया। बस उसे मौका मिल गया वह भी मौका देख के बहती जल धारा में कूद गई और दूसरे तालाब में पहुँच गई। तीसरी मछली ने न तो कुछ सोचा न कुछ किया। वह जाल में फंस गई और तड़प-तड़प कर मर गई। 

12.. Stories In Hindi- लालची बगुला 

एक था तालाब। उसमे बहुत-सी मछलियाँ रहती थी। वही एक बगुला भी रहता था। वे मछलियां उस बगुले से बहुत डरती थी और उससे दूर-दूर रहती थी। बगुले ने सोचा यह तो बड़ी खराब बात है इन मछलियों को किसी भी तरह जाल में फंसना चाहिए। सोचते-सोचते उसे एक तरकीब सूझी। वह मछलियों के पास पहुंचा और उनसे बोला मेने एक बहुत बुरी खबर सुनी है। एक मछेरा जाल लेकर इधर ही आ रहा है। मेने उसे देखा है। वह तुम सबको जाल में फंसाकर मार डालेगा, और खा जायेगा। 

मछलियाँ उस बगुले का विश्वाश तो नहीं करती थी, लेकिन मछेरा से वे बहुत डरती थी। उन्होंने बगुले से पूछा हमे अब क्या करना चाहिए ?

बगुला बड़े गंभीर स्वर में बोला अगर तुमको मुझ पर विश्वाश हो तो में एक रास्ता जानता हूँ। पास के घने बन में कुछ दुरी पर एक तालाब है। उसका जल अमृत जैसा है। मछेरो को उस तालाब के बारे में कुछ पता नहीं। तुम चाहो तो में एक-एक करके तुम सबको वहां पहुंचा दूंगा। 

मछलियाँ तो बहुत बुरी तरह डर गई थी। इसलिए उनकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उन्होंने कहा हमे तुम पर पूरा विश्वाश है। कृपा कर तुम हमे उस तालाब पर ले चलो। यह सुनकर बगुला मन-ही-मन बहुत खुश हुआ और वह बारी-बारी से एक-एक मछली को उस झूठ-मुठ के तालाब पर ले जाता और मार कर खा जाता। 

उस तालाब में एक मगरमच्छ भी रहता था। बगुला इन मछलियों को कहाँ ले जाता है, यह जानने के लिए उसने पूछा, तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ? 

बगुले ने मगर को वही कहानी सुना दी जो मछलियो को सुनाई थी। मगर था तो ताकतवर लेकिन मछेरो के जाल से वो भी डरता था। उसने बगुले से कहा मुझे भी तुम उस तालाब पर पहुंचा दो। 

बगुला बहुत खुश हुआ और अगले दिन मगर को साथ लेकर उसी स्थान पर पहुंचा जहाँ वह मछलियों को मार कर खाया करता था। मगर उस स्थान को देखते ही सब कुछ समझ गया। यह बगुला बहुत मक्कार है। मछलियों को यहाँ लाकर खा जाता है। मुझे भी इसी तरह मार डालेगा। 

Moral Of The Story - लेकिन वह मगर मछलियों जैसा डरपोक नहीं था। उसने सोचना शुरू किया, अरे में तो मगर हूँ। में उस बगुले से डर जाऊंगा। नहीं, नहीं। 

यह सोचते-सोचते मगर ने बगुले का गला पकड़ लिया और उसे मार डाला। वापस लौटकर बची हुई मछलियों को सारी कहानी सुनाई। बगुले की दुष्टता की बात सुनकर उन्हें बहुत दुःख हुआ पर उनकी जान बच गई। 

13.. Hindi Stories for Reading - अशर्फियों का चोर 

प्राचीन काल में एक नगरी थी, उसका नाम था - श्रावस्ती। वहां प्रसेनजित नाम का एक राजा राज करता था। उसी नगरी में किसी दूसरे देश का एक ब्राह्मण भी अपने मित्र के घर में रहता था। उसे खूब पैसा मिलता था और वह उन पैसो को जोड़ा करता था। 

इस तरह उसने दो हजार अशर्फियाँ जोड़ ली। फिर उनको पास के जंगल में एक पेड़ के निचे गाड़ दिया। घर में रखता तो चोरो के चुरा ले जाने का डर था। बैंक तब थे नहीं। लेकिन उसका मन अब भी शांत नहीं हुआ। उसे बराबर यह शंका रहती थी, कि कहीं कोई उन अशर्फियों को वहां से भी खोद कर न ले जाए। 

और सचमुच एक दिन ऐसा हो गया। वह रोज उन अशर्फियों को देखने जाया करता था। उस दिन भी गया लेकिन क्या देखा कि किसी ने उस स्थान को खोद डाला है और अशर्फियाँ निकाल ली है। अब तो जैसे उसके प्राण ही निकल गए। उसे बहुत दुःख हुआ। उसने सोचा अब जी के क्या होगा। इससे तो मर जाना अच्छा है। लेकिन मरना भी क्या आसान है ! अब करे तो क्या करे ? 

इसी उधेड़-बुन में एक दिन उसने इस बात की चर्चा अपने मित्र से की। उसके बाद वह कहानी एक कान से दूसरे कान, दूसरे कान से तीसरे कान से होती हुई राजा के पास पहुँच गई। सुनकर राजा को भी बहुत दुःख हुआ। उसने ब्राह्मण को बुलाकर पूछा, तुमने किस पेड़ की जड़ में अशर्फियाँ छिपाई थी ?  

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, महाराज मैने नागबला के पेड़ के नीचे अपनी अशर्फियाँ गाड़ी थी। 

राजा ने सुना, एक मिनट सोचा, फिर कहा तुम चिंता मत करो मै पता लगाकर छोडूंगा कि किसने तुम्हारी अशर्फियाँ चुरायी है और अगर पता नहीं लगा पाया तो अपने खजाने से तुम्हे दो हजार अशर्फियाँ दूंगा। यह सुनकर ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने राजा को आशीर्वाद दिया और चला गया। 

राजा बहुत बुद्धिमान था। सोचते-सोचते उसके मन में एक विचार उठा। उसने मंत्री को बुलाकर कहा मेरे सिर में बहुत तेज दर्द रहने लगा है किसी अच्छे वैद्य को बुलाओ। 

बस फिर क्या था ? वैद्य पर वैद्य राजा का इलाज करने लगे। राजा हर वैद्य से एक सवाल जरूर पूछता ''आजकल तुम्हारे पास कितने मरीज आते है उन्हें क्या-क्या दवा देते हो ? 

सभी वैद्य राजा को खुश करने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर जवाब देते थे। एक दिन एक वैद्य ने राजा के इसी प्रशन के उत्तर में, निवेदन किया, में अपने रोगी को नागबला को दवा के रूप में प्रयोग करने के लिए कहता हूँ। 

फिर राजा ने पूछा तुम्हारे उस रोगी का नाम क्या है ?

वैद्य ने कहा, महाराज उसका नाम मातृदत है। 

वैद्य के जाने के बाद महाराज ने मंत्री को बुलाया और कहा जैसे भी हो मातृदत को बुलावा भेजो। 

मातृदत तो उसी शहर में रहता था। उसे ढूंढने में क्या  कठिनाईं होती ? थोड़ी ही देर में मातृदत को राजा के सामने पेश कर दिया गया। 

राजा ने पूछा क्या तुम नागबला का प्रयोग करते हो ?

मातृदत ने उत्तर दिया जी महाराज वैद्य जी ने मुझे वही दवा लेने को कहा है। 

राजा ने फिर पूछा तुम्हारे लिए नागबला कौन लाता है ? 

मातृदत ने उत्तर दिया महाराज मेरा नौकर मेरे लिए नागबला लाता है। 

तब राजा ने कहा तुम अपने नौकर को तुरंत मेरे पास भेज दो में उससे मिलना चाहता हूँ। 

नौकर ऊपर से बहुत प्रसन्न था पर न जाने क्यों, अंदर ही अंदर डर भी रहा था। 

राजा ने उससे पूछा क्या तुम अपने स्वामी के लिए नागबला लाते हो ?

नौकर ने हाथ जोड़कर और सर झुकाकर कहा हां महाराज में ही लता हूँ। 

Moral of the story - तब राजा बोले हमे मालूम हुआ, तुम्हे नागबला की जड़ से दो हजार अशर्फियाँ मिली है। वे अशर्फियाँ एक ब्राह्मण की है। जाओ और उन्हें ब्राह्मण देवता को सौंप दो। 

नौकर क्या कर सकता था ! वह अशर्फिया ले आया और उन्हें ब्राह्मण को सौंप दिया। ब्राह्मण राजा की चालाकी से बहुत प्रसन्न हुआ। 

14. Hindi Moral Stories for Reading  - भाग्य का खेल 

बहुत समय पहले की बात है। किसी नगर में किशन नामक एक भिखारी रहता था। सुबह होते ही अपना चोगा और कटोरा तैयार करता और भीख मांगने निकल पड़ता था। वह हर दरवाजे पर जाकर एक ही टेर लगाता-

''देने वाला श्री भगवान 

हम सब है उसकी संतान'' 

उसे जो कुछ भी मिल जाता वह उसी से संतुष्ट हो जाता। उसका एक मित्र जगन्नाथ भी भीख मांगता था। वह दरवाजे पर जाकर हाँक लगाता-

''देने वाला महाराज 

वही दिलाएगा भोजन आज'' 

किशन और जगन्नाथ भीख मांगने के लिए राजा के महल में भी जाते थे। राजा प्राय दोनों की आवाज सुनता था उन दोनों को भीख देता था किन्तु वह जानना चाहता था किसकी बात सच है ? इंसान को सब कुछ देना, भगवान के हाथ में है या फिर राजा के हाथ में है ?

एक दिन राजा ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक बड़ा सा पपीता लिया। उसका एक टुकड़ा काटकर उसके भीतर सोने के सिक्के भर दिए। टुकड़े को जो का त्यों जोड़ दिया। तभी किशन भीख मांगने आ पहुंचा। 

राजा ने उसे दाल-चावल दिलाकर विदा किया। जगन्नाथ खंजड़ी बजाता आया और टेर लगाई-

''देने वाला है महाराज 

वही दिलाएगा भोजन आज'' 

राजा ने सिक्को से भरा हुआ वह पपीता उसके हवाले कर दिया। जगन्नाथ ने वह पपीता दो आने में एक सब्जी की दुकान पर बेच दिया। पेसो से उसने उस दिन भोजन का जुगाड़ कर लिया। 

थोड़ी देर बाद किशन सब्जी वाले की दुकान के आगे से निकला। उसने मीठी आवाज में अपनी बात दोहराई। सब्जी वाले ने वह पपीता किशन को दे दिया। कृपाल उसे दुआए देता हुआ घर लोट आया। 

घर आकर उसने पपीता काटा तो सिक्के देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। उसने तुरंत सिक्के उठाये और सब्जी वाले के पास पहुँच गया। उन सिक्को को देकर कहा,भाई यह तुम्हारे पपीते में से निकले है। इन पैसो से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।

सब्जी वाला भी ईमानदार था। वह बोला यह पपीता तो मुझे जगन्नाथ ने दिया था। तब तो यह सिक्के भी जगन्नाथ के ही है। जगन्नाथ ने सिक्के देखकर कहा ये तो राजा के है। वह पपीता मुझे भीख में राजा ने दिया था। 

Moral of the story - राजा तीनो व्यक्तियों और सिक्को को देखकर हैरान रह गया। सारी कहानी सुनकर उन्हें यकीन हो गया कि इंसान को भगवान पर ही भरोसा करना चाहिए। वही सबको देने वाला है। राजा ने तीनो को भोजन कराया और उपहार देकर विदा किया। 

15.. Hindi Stories for Reading  - संगीतकार की कहानी 

एक संगीताचार्य थे। उनके पास एक आदमी संगीत में निपुणता प्राप्त करने की इच्छा से आया और उनसे बोला, आप संगीत के महान आचार्य है और संगीत कला प्राप्त करने में मेरी गहरी रूचि है। 

इसलिए आप से निवेदन है कि आप मुझे संगीत की शिक्षा प्रदान करने की कृपा करे। संगीताचार्य ने जवाब दिया, जब तुम्हारी इतनी उत्कृष्ट इच्छा है, मुझसे संगीत सीखने की तो मेरे घर आ जाओ में सीखा दूंगा। उस आदमी ने आचार्य से पूछा कि इस कार्य के बदले उसे क्या सेवा करनी होगी। आचार्य ने कहा कुछ खाश नहीं मात्र सौ स्वर्ण मुद्राये देनी होगी। 

सौ स्वर्ण मुद्राये है तो बहुत ज्यादा और मुझे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान भी है पर ठीक है में सौ स्वर्ण मुद्राये आपकी सेवा में प्रस्तुत कर दूंगा। उस आदमी ने कहा इस बात पर आचार्य ने जवाब दिया यदि तुम्हे संगीत का पहले से थोड़ा बहुत ज्ञान है तब तो तुम्हे दो सौ स्वर्ण मुद्राये देनी होगी। जिज्ञासु ने हैरानी से पूछा, आचार्य यह बात तो हिसाब-किताब के अनुकूल नहीं है। 

Moral of the story - मेरी समझ से भी एक दम परे है। काम कम करने पर कीमत ज्यादा ? आचार्य ने उत्तर दिया, काम कम कहाँ है ? पहले तुमने जो सीखा है उसे मिटाना है, उसे भूलाना होगा तब फिर नए सिरे से सीखना प्रारम्भ करना पड़ेगा। क्योकि पहले से भरे हुए पात्र में कुछ भी और डालना असम्भव है। जिज्ञासु सब कुछ समझ गया। 

16. Stories For Reading In Hindi - जंगलराज 

एक जंगल के जलकुंड पर एक मेमना पानी पी रहा था। अभी उसने पानी पिया ही नहीं इतने में एक चिता उधर आया। मेमने को देखकर चीते के मुँह में पानी आ गया। उसने सोचा कैसे न कैसे इस मेमने को ग्रास बनाया जाए। चिता मेमने के पास आया। मेमने ने चीते से राम-राम की। 

चीते ने गुर्राते हुए कहा, वाह आज तुम बच नहीं पाओगे। में तो तुम्हे खाऊंगा। मेमने ने कातर स्वर में कहा, जंगल के राजा ! मेरा क्या कसूर है उसे बताने की कृपा करे। तुमने मुझे एक साल पहले गाली दी थी चीते ने जवाब दिया। मेमना बोला, वनराज ! 

में तो अभी छह महीने का हूँ। चीते ने कहा, तब तुम्हारे बाप ने दी होगी मुझे गाली। मेमने ने कहा, मेरे पिता मेरे जन्म के पहले ही एक लकड़बग्घे के हाथो मारे गए। 

चीते ने पलटकर जवाब दिया, कोई बात नहीं तुम्हारी माँ ने गाली दी होगी। मेमने ने कहा, मेरी माँ तो इस जंगल में कभी आई ही नहीं। मेरी माँ तो गड़रिये के बाड़े में बंधी रहती है। 

Moral of the story - चीते ने पलटवार किया, फिर भी तुम नहीं बच सकते। मुझे एक भेड़ ने गाली दी थी तुम भेड़ के जाये-जन्मे, इसलिए तुम्हारे जाति भाई की सजा तुम्हे भुगतनी होगी। यही जंगलराज का कानून है। मेमना मिमियाता रह गया और चीते ने उसे काल का कवल ( कौर ) बना दिया। 

17. In Hindi Stories For reading - बोली का घाव

एक जंगल में एक शेर रहता था। वह अपने आप में मस्त रहता। किसी को बेवजह तंग नहीं करता। जंगल से कुछ दुरी पर एक कस्बा था। उस कस्बे में एक लकड़हारा रहता था। 

जंगल में शेर के भय से किसी के जाने की हिम्मत नहीं होती थी। लकड़हारे ने एक दिन हिम्मत की और जंगल में लकड़ी काटने पहुँच गया। लकसी काटने की आवाज शेर के कानो में पड़ी। वह चौकन्ना हुआ। 

आदमी से उसे भी डर लगता था। वह लकड़हारे के पास पहुँचा। शेर को सामने देख लकड़हारा थर-थर काँपने लगा। उसे साक्षात् मौत सामने दिखाई दे रही थी। शेर ने चेतावनी देते हुए कहा ''अगर तुम्हे अपनी जान प्यारी है तो दुबारा इस जंगल में दिखाई मत देना। 

लकड़हारे ने गिड़गिड़ा कर कहा, वनराज में गरीब आदमी हूँ। कोई और धंधा है नहीं ! बाल बच्चे भूखे मर जायेंगे। कहते हुए लकड़हारा फफक कर रो पड़ा। शेर को लकड़हारे की दशा पर तरस आ गया। उसने कहा ठीक है हरे पेड़ो को हाथ मत लगाना। सुखी लकड़ियाँ ही काटना तथा किसी और से कुछ न कहना। 

ठीक है हुजूर ! अब तो लकड़हारा रोज आता और गट्ठर बांधकर कस्बे में ले जाता। लकड़ी का धंधा अच्छा चल निकला। लकड़हारे का गुजारा हो रहा था। 

कस्बे के लोग आश्चर्य करते कि लकड़हारा उस जंगल से कैसे लकड़ियाँ काट लाता है जहाँ शेर रहता है। बहुत से लोग उससे पूछते। मगर वह टाल जाता। कोई कहता लकड़हारा सचमुच बहादुर है ! कोई कहता ऐसा साहसी आदमी तो आस-पास कही नहीं मिलेगा। 

सुनकर लकड़हारा फूला न समाता। उसे अब अपने आप पर घमंड होने लगा था। एक दिन एक ग्राहक ने लकड़ी खरीदते वक्त उससे पूछा तुम बड़े बहादुर हो, तुम उस जंगल से कैसे लकड़ियाँ काट लाते हो, जिसमे शेर रहता है। लकड़हारा कई दिनों से अपनी प्रशंसा सुन रहा था। बड़े घमंड से बोला अरे वह भी कोई शेर है गीदड़ है गीदड़ ! डरता है मुझसे। 

कहते है दीवारों के भी कान होते है। इस कहावत को लकड़हारा भूल गया शायद। किसी तरह यह बात शेर के कानो में पहुँच गई। शेर गुस्से में दहाड़ा। जंगल के जीव डरकर भागने लगे। पेड़ो के पक्षी उड़ गए। सभी ने सोचा आज किसकी सामत आई है। जंगल के जानवरो और पक्षियों में खुसुर-फुसुर होने लगी। 

दूसरे दिन लकड़हारा तो अपनी धुन में जंगल पहुंचा। जैसे ही उसने अपनी कुल्हाड़ी सूखे हुए पेड़ पर चलाई, सामने शेर को देखकर सकते में आ गया। शेर की आँखे गुस्से से अंगारे सी दहक रही थी। नथुने फड़क रहे थे। शेर को गुस्से में देखकर लकड़हारे की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई।  

वह कुछ समझ पाता इससे पहले शेर ने गुस्से में एक दहाड़ मारी। लकड़हारा डर के मारे काँपने लगा। वह शेर के पेरो में गिर पड़ा। बोला, हुजूर कुछ गलती हो गई हो तो माफ कर दो। शेर को लकड़हारे की दशा पर तरस भी आ रहा था। 

वह लकड़हारे से बोला ''जिस थाली में कहते हो उसी में छेद करते हो ! क्या कहा था तुमने कस्बे में जाकर ?

हुजूर गलती हो गई। लकड़हारे ने प्राणो की भीख मांगते हुए कहा। अच्छा.......! शेर ने व्यंग्य कसते हुए कहा, में कायर हूँ, गीदड़ हूँ, और तुम बहादुर हो। लकड़हारा समझ गया कि बस वह कुछ ही पलो का मेहमान है। 

उसने शेर से विनती की, हुजूर अबकी बार माफ कर दो। आइंदा ऐसा नहीं होगा। ठीक है अपनी कुल्हाड़ी उठाओ। शेर ने लकड़हारे से कहा। लकड़हारे ने डरते-डरते अपनी कुल्हाड़ी उठाई। 

शेर ने फिर कहा इसे मेरी पीठ पर मारो। अब तो लकड़हारा और भी डर गया। उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह कुल्हाड़ी से शेर की पीठ पर वार करे। उसने ऐसा करने से मना कर दिया। शेर ने लकड़हारे को समझाया, डरने की कोई बात नहीं है। जैसा में कहता हूँ वैसा करो। वरना.........! शेर ने फिर चेतावनी के स्वर में कहा। 

मरता क्या न करता। लकड़हारे ने शेर के आदेशानुसार कुल्हाड़ी का एक वार डरते-डरते शेर की पीठ पर किया। कुल्हाड़ी शेर की पीठ में गड़ गई। खून की धारा बह निकली। लेकिन शेर ने उफ तक नहीं की। उसने लकड़हारे से कहा, ठीक एक सप्ताह बाद मुझसे मिलना, यही इसी जगह और इसी वक्त ! लकड़हारे ने डरते-डरते हाथ जोड़ते हुए विदा ली। 

ठीक एक सप्ताह बाद लकड़हारा डरते-डरते शेर द्वारा तय स्थान पर पहुँचा। वनराज उसी का इंतजार कर रहा था। आते ही उसने लकड़हारे से अपनी पीठ का घाव बताया। पूछा, कुल्हाड़ी के वार से हुए घाव का एक सप्ताह हुआ है। क्या यह भर गया है ? लकड़हारे ने कहा, जी हुजूर बिलकुल भर गया, निशान तक नहीं है। शेर ने कहा, देखा तुम्हारी कुल्हाड़ी से हुआ घाव भर गया लेकिन तुम्हारी बोली का घाव अभी तक हरा है। 

Moral of the story - कटु और कड़वी बोली का घाव दिल पर होता है, जो कभी नहीं भरता, जबकि हथियारों से उत्पन्न घाव कुछ दिन बाद भर जाते है। मेने तो तुम्हे क्षमा कर दिया। भविष्य में इस सीख को याद रखना। फिर कभी ऐसी गलती मत करना। बोली में ही सब कुछ है। बोली ही अमृत है और बोली ही जहर है। जाओ अपना गुजर-बसर करो ! यह कहकर शेर जंगल में गायब हो गया। लकड़हारा सब कुछ समझ गया। 

18. Latest Stories For Reading In Hindi - ईमानदार राजा की कहानी

राजा विक्रम अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वो अपने लिए महल बनवा रहे थे। राजमहल का नक्शा तैयार हो चूका था। पर एक समस्या आड़े आ रही थी। राजमहल के निर्माण-स्थान के पास ही एक झोपडी थी। इस झोपडी के कारण राजमहल की शोभा प्रभावित हो रही थी। 

राजा ने झोपडी के मालिक को बुलवाया। उन्होंने अपनी समस्या के बारे में झोपडी के मालिक को बताया और झोपडी के बदले मोती रकम देने का प्रस्ताव उसके सामने रखा। पर झोपडी का मालिक बहुत स्वाभिमानी था।

उसने राजा से कहा महाराज माफ करे आपका प्रस्ताव मुझे मंजूर नहीं है। अपनी झोपडी मुझे जान से भी ज्यादा प्यारी है। इसी झोपडी में मेरा जन्म हुआ, मेरे बच्चे बड़े हुए, मेरी पूरी उम्र इसी में गुजर गई। में अपनी इसी झोपडी में मरना भी चाहता हूँ। 

Moral of the story - राजा ने सोचा इस गरीब के साथ ज्यादती करना उचित नहीं है। उसने अपने मंत्री से कहा ''कोई हर्ज नहीं'' इस झोपडी को यही रहने दो। जब लोग इस शानदार महल को देखेंगे तो वे मेरे सौन्दर्यबोध की सराहना अवश्य करेंगे। जब वे राजमहल के समीप इस झोपडी को देखेंगे तो मेरी न्यायप्रियता, सह्रदयता और दया भाव की भी तारीफ करेंगे।  

19. New Reading Stories In Hindi  - मोहिनी की मार 

किसी गांव में सीधे-सरल पंडित-पंडिताइन रहते थे,जिनकी गुजर-बसर बड़ी मुश्किल से होती थी। किसी ने पंडित जी को पूजा-पाठ के लिए बुला लिया तो दक्षिणा से दिन निकल गया, नहीं तो राम भरोसे नैया थी। श्राद्व पक्ष आया तो पंडिताइन ने कहा, तुम लोगो का श्राद्व करवाते फिरते हो। धन के संकट के कारण में सदा अपना मन मसोस कर रह जाती हूँ। मेरी बड़ी इच्छा है कि हम भी अपने पूर्वजो का श्राद्व भली भाँति करे। 

कुछ जमा हो तब ना........! कुछ भी हो, इस बार श्राद्व जरूर करना है। चाहो तो बैल बेच दो। पंडित जी बैल लेकर निकल पड़े। पंडिताइन ने समझाया, देखो सौ रूपये से कम में मत बेचना। अगर सौ में सौदा ना पटे तो नब्बे, सत्तर से तो कम किसी हालत में नहीं। 

रास्ते में एक बकरी चराने वाले ने पूछा, क्यों भाई, बैल लेकर कहाँ जा रहे हो ? बेचने जा रहा हूँ। बकरी वाला वास्तव में एक ठग था। बात बनाते बोला, बैल की जरूरत तो मुझे भी है, चाहो तो मुझे बेच दो। पंडित बोला सौ रूपये लूंगा। सौ रूपये तो बहुत अधिक है ठग बोला।

बैल के दाम किसी दूसरे आदमी से तय करवाना चाहिए। सामने पहाड़ी पर एक बूढ़ा बैठा है। चलो उसी से पूछते है। ठग ने पासा फेंका। बूढ़े ने बैल को घूम-घूम के देखा और गर्दन हिलात बोला यह तो एक दम बूढ़ा बैल है.....! चार रूपये से ज्यादा इसकी कीमत नहीं। भोले पंडित जी हैरान तो हुए पर बूढ़ा भला बैल की कीमत क्यों गलत बातयेगा। 

जरूर बाजार में इसकी कीमत चार रूपये ही होगी, ऐसा सोचकर पंडित जी ने अपना बैल चार रूपये में बेच दिया। घरवाली ने माथा ठोक लिया। कहने लगी, तुम तो बुदू ही रहोगे। ठगो ने मिलकर तुम्हे लूट लिया और तुम आराम से घर चले आये। अब तुमको इसका बदला जरूर लेना चाहिए। पंडिताइन ने पंडित जी को सारी योजना समझा दी।

एक मोहिनी स्त्री का वेश बना पंडित जी उसी स्थान पर पहुंचे। ठग भी शिकार की तलाश में वही घूम रहा था। स्त्री को देख ठग बोला, कहाँ जाने का विचार है ? स्त्री की आवाज बनाते पंडित जी ने कहा, मोहिनी तो घर ही छोड़ आई है....! रह लेगी कही भी। ठग बोला मेरा घर पास ही है मोहिनी, वही चलो। 

पंडित जी ठग के साथ चल दिए। वहाँ बैल की कीमत निश्चित करने वाला बूढ़ा भी बैठा था। ठग ने कहा, बाबा देखो में किसे लेकर आया हूँ। स्त्री को देख बूढ़ा खुश हो गया। कहने लगा, बेटा में इससे विवाह कर लेता हूँ। बेटा मान गया। 

स्त्री को वहीं छोड़ कर वह किसी दूसरे मुर्ख की तलाश में चला गया। उधर बूढ़े ने स्त्री पर अपना प्रभाव जमाने के लिए ठगी से बटोरी गई धन-दौलत दिखानी शुरू कर की। पंडित जी ने अचानक वही से एक डंडा उठाया और बूढ़े को पीटना शुरू कर दिया। अरे..... अरे.....अरे यह क्या कर रही हो......मोहिनी ? 

Moral of the story - हैरान बूढ़ा दर्द से बिलबिलाते चिलाया। लोगो का धन लिया खूब डकार अब खा मोहिनी की मार ! चार डंडो ने ही बूढ़े के होश उदा दिय। वह वही गिर पड़ा। पंडित जी ने बैल की कीमत के सौ रूपये लिए और घर आ गए। पंडिताइन प्रसन्न हुई। बड़े उत्साह से श्राद्व की तैयारी में झूठ गई।   

20.. Kids Reading Stories In Hindi - बोली का कमाल 

दो बहने थी, संतो और बंतो। साथ खेलती, साथ खाती, कभी झगड़ती, फिर रूठती-मनाती और रात को एक दूसरी के गले में बाहे डालकर सो जाती थी। देखते देखते दोनों बड़ी हो गयी। संतो बड़ी थी , सो उसका विवाह पास के गांव के मुखिया खड़कसिंह से हो गया। संतो चली गई तो बंतो अकेली रह गई। वह संतो को याद कर-कर रोती। 

संतो तो अपनी घर गृहस्थी में मगन हो गई, पर बंतो की बाते उसे भी याद आती। एक दिन माँ ने बंतो से कहा, बहन को इतना याद करती है, जा कुछ दिन उसके पास रह आ। बंतो खुशी-खुशी संतो की ससुराल पहुंची। उसे संतो के यहाँ बड़ा अच्छा लगा। पर जाने क्यों वह खड़कसिंह को देखती, उसे कुछ अजीब सा लगता था। 

उसकी बड़ी-बड़ी मूँछ, तगड़ी सी पगड़ी और कमर में कतार देखकर वह सहम जाती। जीजा ने भी उससे कभी हंस कर बात नहीं की थी। एक बार खड़कसिंह चौपाल पर बैठकर गांव के लोगो से बतिया रहा था। घर में संतो भोजन के लिए उसका इंतजार कर रही थी। 

बहुत देर हो गई तो संतो ने बंतो से कहा, जा बंतो अपने जीजा को बुला ला। मुखिया क्या बने, उन्हें खाने-पिने का होश ही नहीं रहता। बंतो जैसी थी, वैसी भागी गई और चौपाल पर जाकर बोली :-

 ''दिन भर बातो-गप्पो की धुन 

  नहीं लेते घर की सुध-बुध 

  खाना है तो घर आओ 

  नहीं तो भाड़ में जाओ'' 

साली की ऐसी बात सुन खड़कसिंह को बड़ा बुरा लगा। वह रोब से बोला :-

''ना बाल सँवारे ना पाँव में जूती, भागी चली आई,

 तनिक शर्म ना आई'' 

बंतो रोते-रोते घर पहुँची और सारी बात बताई। तब संतो ने कहा, तुम्हारे जीजा गांव के मुखिया है। उसे तेरा ऐसे बोलना, वह भी इतने लोगो के बीच, नहीं सुहाया। अबकी बार जैसे में कहती हूँ, वैसे बुलाना, कहकर बंतो के कण में कुछ कहा। बंतो दुबारा सजसंवर कर गई और बोली। 

''सिर पर पगड़ी लटके कमर कटार 

 राजा जैसे जीजा मेरे, भोजन है तैयार"

अपनी साली की मीठी बाते सुनकर खड़कसिंह खुशी-खुशी बंतो के साथ चल दिया। 

शिक्षा :- प्यार से कुछ भी बोले तो मनुष्य करने के लिए तैयार हो जाता है।

21. नैतिक कहानियाँ - गंजा मुर्ख 

एक बार एक गंजा आदमी बन में फल खाने के लिए पहुंचा। था वह मुर्ख। वह यह नहीं जान पा रहा था कि फल कैसे खाना चाहिए। 

तभी एक दूसरा नोजवान मुर्ख वहां आया। उसके हाथ में बेल के बहुत से फल थे। वह बहुत भूखा था। इसलिए उन्हें तोडना नहीं चाहता था। इस गंजे मुर्ख को देखकर उसके मन में गुदगुदी होने लगी। उसने मजाक ही मजाक में एक बेल का फल उसके सर पर दे मारा। 

गंजा मुर्ख तो एक बार तिलमिला उठा लेकिन उसे भी बहुत भूख लगी थी और यह फल उसकी भूख मिटा सकता था। इसलिए उसने उस युवक से कुछ भी नहीं कहा उसे डांटा तक नहीं। बस बेल का गुदा खाने लगा। 

उस नवयुवक मुर्ख को यह देखकर और मजा आया। उसने दूसरा फल भी उस गंजे के सर पर दूसरा फल भी दे मारा। तीसरा चौथा यहाँ तक कि सारे फल खत्म हो गए। उधर गंजे का सर भी खून से लथपथ हो गया। 

यह देखकर वह नवयुवक डर गया और वहां से चला गया। उसके बाद वह गंजा भी अपने घर लोट आया।

उसके सर को खून से भरा देखकर घरवालों ने घबराकर पूछा अरे यह सब क्या हुआ ? किसने मारा तुमको ?

उसने उत्तर दिया एक नौजवान के पास बहुत सारे मीठे बेल के फल थे। वह उन्हें मेरे सर पर फेंकता रहा और में उन्हें खाता रहा। 

मीठे फलो के लिए क्या में इतनी चोट भी नहीं सह सकता था ?

उसकी यह बात सुनकर सभी लोग जोर जोर से ठहाके लगाकर हंसने लगे। 

22. Panchtantra Moral Stories In Hindi -खरगोश और हाथी

किसी बन में एक बहुत बड़ा तालाब था उसका नाम था चन्द्रसर। उनके किनारे पर खरगोशो का राजा शीलमुख रहता था। उसकी प्रजा भी वही तालाब के चारो ओर बस गई थी। 

उनके दिन बड़े सुख से बीत रहे थे। लेकिन एक साल बारिश बिलकुल भी नहीं हुई। चारो तरफ पानी का अकाल पड़ गया। बस इसी तालाब  कुछ पानी बचा था। 

कुछ दूर पर हाथियों का राजा चतुर्दत भी रहता था। हाथियों को तो पानी खूब चाहिए। इसलिए जब और कही पानी ना मिला तो ढूंढते ढूंढते वे इस तालाब पर आ पहुंचे। 

यहाँ पर तो तालाब के चारो ओर किनारो पर खरगोश रहा करते थे। हाथियों के आने पर वे उनके पांवो के निचे कुचले गए और मर गए। 

यह देखकर उनका राजा शीलमुख बहुत उदास हुआ। उसने अपने सारे साथियो को इकट्ठा किया। 

राजा शीलमुख ने साथियो से कहा हाथियों को इस तालाब का पता लग गया है अब वो रोज यहाँ आएंगे और हम सब को मार डालेंगे। हमे कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे वे यहाँ न आ सके। 

उन सभा में विजय नाम का एक खरगोश रहता था। वह बहुत ही सुंदर और चतुर था। मुसीबत के वक्त वही काम आता था। राजा ने उससे कहा विजय तुम हाथियों के राजा के पास जाओ। 

उन्हें ऐसी कोई बात बताओ जिससे वह सब हाथी यहाँ आने का विचार छोड़ दे। विजय तुम ही यह काम कर सकते हो। जब तुमने कोई काम करने का कोई बीड़ा उठाया है तो तुम उसमे  तुम बहुत चतुर हो अपने साथियो को कैसे भी करके बचाओ। 

अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर विजय बहुत प्रसंन्न हुआ। और तुरंत हाथियों के राजा के पास चल पड़ा। जब हाथी उसे आते हुए दिखाई दिए तो वह एक पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया और बोला हे हाथियों के राजा में भगवान चन्द्रमा का दूत हूँ। 

उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। और कहा है की यह चंद्रसर नाम का  तालाब मेरा है। में इसमें रहता हूँ ओर इसके चारो ओर रहने वाले खरगोश मेरे सेवक है। में इनका स्वामी हूँ तुमने मेरे बहुत से सेवको को मार डाला है और तालाब का पानी भी गन्दा कर दिया है। 

हाथियों का राजा यह सुनकर बहुत डर गया और बोला हे दूत क्या सचमुच चंद्रदेव मुझसे इतना नाराज है। 

खरगोश ने बहुत गंभीर स्वर में उत्तर दिया नाराज तो बहुत थे , पर हमारे प्रार्थना करने के कारण इस बार उन्होंने तुम्हे क्षमा कर दिया है। और कहा है कि यदि तुम कभी इस तालाब पर आओगे तुम्हे उसका दंड भोगना होगा। 

यह सुनकर हाथी ने बड़े विनम्र भाव में कहा भगवान चन्द्रमा मेरे पूजनीय है में उनकी आज्ञा का पालन अवश्य करूंगा में फिर कभी उस तालाब में नहीं आऊंगा। 

विजय ने मन ही मन प्रसन्न होकर कहा आओ में तुम्हे चन्द्रमा के दर्शन करवाए देता हूँ तुम उनसे स्वयं क्षमा मांग लेना। 

यह कहकर विजय खरगोश हाथी को तालब पर ले गया और चन्द्रमा की पड़ती परछाई को दिखाकर कहा यह है महाराज चंद्रदेव। 

हाथी ने दूर से उन्हें प्रणाम किया और क्षमा मांगी। उसके बाद वह कभी वहां नहीं आया। खरगोश पहले की भांति हंसी-ख़ुशी रहने लगे और विजय को अपना सबसे पसंदीदा मित्र बनाने लगे। इस तरह एक चतुर खरगोश विजय उनके सभी साथियो की जान बचाने में कामयाब हो पाया।

23. Best Hindi Stories - कानो का सुख

किसी नगर में एक गायक रहता था। वह बहुत ही प्यारा और सुन्दर गाता था। एक दिन एक धनवान व्यक्ति ने उसे बुलाया और उसका गाना सुनने की इच्छा प्रकट की। 

गायक तो यही चाहता था। उसने धनवान सेठ को कई सुंदर-सुंदर गाने सुनाये। सेठ बहुत खुश हुआ। उसने अपने खंजाची को बुलाया और कहा ''इस गायक ने मुझे अच्छे-अच्छे गीत सुनाकर मेरा मन बहलाया है। इसे दो हजार रूपये दे दो। 

अभी लाता हूँ। यह कहकर खंजाची वहां से चला गया। लेकिन कई घंटे बीत गए, वह लौटकर नहीं आया। तब गायक स्वयं उसके पास पहुंचा। लेकिन खंजाची ने तब भी उसे पैसे नहीं दिए। गायक को बहुत गुस्सा आया और वह सेठ जी के पास पहुंचा और कहने लगा आपके कहने पर भी खंजाची ने मुझे रूपये नहीं दिए। 

सेठ ने उत्तर दिया ''उसने ठीक किया तुम्हे देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 

गायक यह सुनकर हैरान रह गया और बोला मेने आपको गाना सुनाया है। 

सेठ ने उत्तर दिया ''हाँ हां तुमने मुझे गाना सुनाया है। मेरे कानो को सुख दिया है। इसी प्रकार मेने भी रूपये देने की बात कहकर तुम्हारे कानो को सुख दिया है। तुम्हे रूपये नहीं मिल सकते। 

बेचारा गायक निराश होकर वहां से चला गया। 

24. रुई कैसे साफ़ की गई

एक किसान था। था तो वह बहुत मेहनती ओर जब भगवान के यहाँ अकल बँट रही थी तो वह कही सोया पड़ा था इसलिए अकल नाम की कोई चीज थी ही न नहीं उसके पास। 

मेहनत वह बराबर करता था। एक बार उसके खेत में रुई बहुत ज्यादा हुई। उसे लेकर वह उसे बेचने के लिए बाजार में गया लेकिन किसी ने भी उसकी रुई नहीं खरीदी। सबने यही कहा यह रुई साफ़ नहीं है साफ़ करके लाओ। 

सुनार ने उस सोने को देखा और परखा और फिर उसे आग में डाल दिया वह शुद्व हो गया। 

वह यह सब देख रहा था बहुत खुश हुआ। घर पहुंचकर उसने बहुत सी लकड़ियाँ और उपले लेकर आग जलाई और फिर उसमे रुई को दाल दिया। 

देखते ही देखते वह सारी रुई कुछ ही क्षणों में जलकर भस्म हो गई। शुद्ध रुई के स्थान पर उस मुर्ख के पास केवल राख ही बची।

25. Hindi Story For Kids - धनवान मुर्ख 

किसी नगर के पास के मठ था। उस मठ में बहुत से मुर्ख रहते थे। उनमे एक धनवान मुर्ख भी था। किसी ने उसे बताया कि तालाब बनवाने से बहुत पुण्य मिलता है। इसलिए उसने उस मठ के पास के एक तालाब बनवाया और उसके चारो किनारो को बंधवा दिया। 

एक दिन उसने जाकर देखा कि उस तालाब के किनारे किसी ने उखाड़ दिए। 

दूसरे दिन गया तो भी उसने यही देखा। तीसरे दिन गया तो भी किनारे उखड़े हुए थे। वह सोचने लगा यह कौन है जो रोज आकर तालाब के किनारे उखाड़ जाता है। 

एक दिन वह सवेरे ही वहां पहुंचा। उसे बड़ा अचरज हुआ कि आकाश से एक सुन्दर बैल उतर कर वहां आया और उसने अपने सींगो से तालाब के किनारे उखाड़ डाले। 

तब उस धनवान मुर्ख ने सोचा कि यह बैल हो या न हो पर आता तो स्वर्ग से है तब क्यों ना में उसकी पूंछ पकड़कर उसके साथ स्वर्ग चला जाऊ। यह सोचकर उसने बैल की पूंछ पकड़ ली वह बैल उड़ गया धनवान मुर्ख भी बैल की पूंछ पकड़कर बैल के निवास स्थान कैलाश पर्वत पहुँच गया। 

वहां खाने के लिए लड्डू पेड़े जैसे बड़े स्वादिष्ट पदार्थ थे। वह मुर्ख धनवान रोज वहां रहकर उन्हें खाने लगा। वह बैल सदा की तरह रोज वहां आता जाता था। मुर्ख ने सोचा क्यों न एक बार फिर बैल की पूंछ पकड़कर धरती पर घूम आऊं। 

उसने ऐसा ही किया और वह धरती पर आ पहुंचा। वहां वह अपने सभी मित्रो से मिला। उसके मुर्ख साथियो ने उससे पूछा तुम कहाँ चले गए थे यार ?

धनवान मुर्ख ने उन्हें सारी कहानी सुनाई। यह कहानी सुनकर उसके सभी साथियो ने कहा हमे भी वहां ले चलो हमे भी लड्डू पेड़े खाने है।

उस धनवान मुर्ख ने अपने साथियो को वहां जाने का मार्ग बता दिया और कहा सबसे पहले में उसकी पूंछ पकड़कर लटक जाऊंगा। फिर बारी बारी से एक दूसरे के पैर पकड़कर लटक जाना है। 

वे सब बहुत प्रसन्न हुए। अगले दिन जब बैल आया तो धनवान मुर्ख ने अपने दोनों हाथो से पूंछ पकड़ ली। दूर मुर्ख ने उसके पैर पकड़ लिए। तीसरे ने दूसरे के पकडे और चौथे के इस प्रकार पकड़ते हुए उनकी श्रखंला जंजीर जैसी बन गयी। 

बैल उन्हें आकाश में ले उड़ा। ऊपर चलते चलते अचानक उस धनवान मुर्ख से किसी एक अन्य मुर्ख ने पूछा तुमने जो लड्डू खाये थे वो कितने बड़े थे। धनवान मुर्ख ने लड्डुओं का नाप बताने के लिए जैसे ही बैल की पूंछ से हाथ छोड़े वैसे ही वो सारे मुर्ख धरती पर आ गिरे और मर गये। 

26. Stories In Hindi - मुर्ख ब्राह्मण और बिलाव 

उज्जैन नगरी में एक मठ था। उस मठ में एक ब्राह्मण रहता था। वह बड़ा ही महामूर्ख था। उस मठ में चूहे भी रहते थे। चूहे रात को जोरदार उत्पात मचाते थे। बेचारा ब्राह्मण रात को आराम से सो भी नहीं पाता था। 

एक दिन ब्राह्मण का मित्र उससे मिलने आया। तब उसने अपने मित्र को चूहों के उपद्रव के बारे में बताया और गहरी चिंता जाहिर की। 

मित्र बोला अरे चूहों से छुटकारा पाना तो बहुत आसान है। अपने मठ में एक बिलाव पाल लो वह इन सारे चूहों को खा जायेगा। 

मुर्ख ब्राह्मण ने कहा अरे यह बिलाव होता क्या है ? मेने तो कभी देखा ही नहीं ? 

मित्र ने उत्तर दिया अरे तुम बिलाव को नहीं जानते ! उसकी आँखों का रंग भूरा होता है और शरीर का रंग पीला और मठमेला होता है उसकी पीठ पर सुनहरे बाल होते है। वह अक्सर गलियों में घूमता रहता है। 

यह सब बताकर मित्र अपने घर चला गया। तब उस ब्राह्मण ने अपने शिष्यों को वहां बुलाया और कहा तुम सब ने बिलाव की पहचान तो सुन ही ली है कल एक बिलाव ढूंढ कर ले आना। 

गुरु की आज्ञा पाकर सभी शिष्य बिलाव को ढूंढने निकल गए। वे बार बार रठते रहते - उसकी आँखे बुरी होती है। उसके बाल सुनहरे होते है। वह अपनी पीठ पर बालो वाला मृगचर्म ओढ़े रहता है। 

आखिर एक दिन उन्हें ऐसा जीव मिल ही गया। वह  ब्रह्मचारी था। वे उसी को बिलाव समझ कर उठा लाये। गुरूजी भी महामूर्ख  उन्होंने भी उसे बिलाव ही समझा और रात के समय उसे  कमरे में बंद कर दिया। 

सवेरे वह मित्र आया और उसने देखा कि कमरे  में एक ब्रह्मचारी बंद था। मित्र ने ब्राह्मण को कहा आपने उन्हें क्यों बंद किया हुआ है कमरे में ?

मुर्ख ब्राह्मण ने उत्तर दिया तुमने ही तो कहा था बिलाव को पकड़ने के लिए। सो इसे हमने पकड़कर कमरे में बंद कर दिया। 

यह सुनकर मित्र बड़े जोर से हंसा और बोला तुम बड़े ही महामुर्ख हो ! यह बिलाव नहीं एक ब्रह्मचारी है। बिलाव के तो चार टंगे और एक पूछ भी होती है यह तो आदमी है। 

यह सुनकर उन मूर्खो को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने ब्रह्मचारी को छोड़ दिया परन्तु जब लोगो को यह स्टोरी पता चली तो वे  खूब हँसे और कहने लगे मुर्ख तो मुर्ख होते है पर पागल भी होते है यह आज हमे पता चला है। 

27. Moral Story - धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि

बहुत पुरानी बात है मित्रो ! हजारो साल पुरानी बात है, उसमे दो भाई रहते थे। दोनों का स्वभाव इतना अलग था कि एक का नाम पड़ गया था - धर्मबुद्धि और दूसरे का दुष्टबुद्धि। 

जैसा कि उन दिनों में होता था, वे धन कमाने के लिए प्रदेश गए। उन दिनों में प्रदेश को दिशावर भी कहते थे। दोनों भाइयो ने प्रदेश में रहकर बड़ी मेहनत से कार्य किया और दो हजार अशर्पियाँ कमाई। 

जब वे घर लोट रहे थे तो अपने घर के पास आकर उन्होंने आपस में सलाह की और एक हजार अशर्पियाँ एक पेड़ के नीचे गाड़ दीं। दोनों ने आपस में सलाह कर ली की यदि हमे कोई मुशीबत पड़ी तो यह एक हजार अशर्पियाँ हमारे काम आएगी। बाकि एक हजार अशर्पियाँ दोनों ने आपस में बाँट ली। 

एक दिन दुष्टबुद्धि के मन में एक दुष्ट विचार आया कि क्यों न में वे एक हजार अशर्पियाँ जो पेड़ की जड़ में दबी हुई है निकाल लाऊ। तब तो में बहुत पैसे वाला हों जाऊंगा। 

उसने ऐसा ही किया जाकर उसने छुपके से पूरी अशर्पियाँ निकाल ली और कुछ दिन बाद वह धर्मबुद्धि के पास पहुंचा। भाई चलो अब हम उन अशर्पियों को बाँट लेते है। 

बेचारे धर्मबुद्धि को इस पर क्या आपत्ति हो सकती थी। अगर तुम ऐसा ही चाहते हो तो चलो हम वही चलते है। 

लेकिन जब वे दोनों वहां पहुंचे और पेड़ की जड़ के नीचे खोदा तो वहां कुछ भी नहीं था। 

धर्मबुद्धि बहुत चकित हुआ लेकिन दुष्टबुद्धि ने तुरंत कहा भाई ये अशर्पियाँ और किसी ने नहीं ली तुम्ही ने निकाली है तुम्हे मेरा आधा भाग देना होगा। 

इस प्रकार दोनों में झगड़ा होने लगा। बात बहुत बढ़ गयी। यहाँ तक कि दुष्टबुद्धि ने अपने भाई धर्मबुद्धि को राजा के दरबार जाने को विवश कर दिया। 

दोनों राजा के दरबार में पहुंचे 

राजा ने पूछा क्या मामला है ?

दुष्टबुद्धि ने सारी कहानी राजा को सुना दी और अंत में कहा ये अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने ही निकाली है। 

राजा ने कहा यह तुम कैसे कह सकते हो ? कौन गवाह है तुम्हारा ?

दुष्टबुद्धि ने कहा मेरा गवाह वही पेड़ ही है। 

उसकी यह बात सुन राजा और न्यायमंत्री बहुत चकित हुए और बोले अच्छा वह पेड़ तुम्हारा गवाह है तो हम कल सुबह वहां चलेंगे और स्वयं उससे पूछेंगे। 

दोनों भाई राजा का आदेश सुनकर अपने अपने घर गए। 

धर्मबुद्धि को कोई चिंता नहीं थी। वह मानता था कि धर्म उसके साथ  है जीत उसी की होगी। लेकिन दुष्टबुद्धि ने घर पहुंचकर सारी कहानी अपने पिता को सुना दी और अपने पिता कहा अभी आप जाकर उस पेड़ की खोल में छिप जाओ। सवेरे जब राजा के अधिकारी पूछे तो कहना कि यह अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने ही निकाली है। 

पिता ने ऐसा ही किया वह रात में जाकर खोल में छिप गया। सवेरे जब न्यायमंत्री वहां पहुंचे तो उन्होंने पेड़ से पूछा ''क्या तुम बता सकते हो कि जो एक हजार अशर्पियाँ दोनों भाइयो ने यहाँ गाड़ी थी वे किसने निकाली है ?

पिता ने खोल के अंदर से जवाब दिया ''अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने चुराई है। 

न्याय मंत्रीं यह सुनकर चकित रह गए। सभी सोचने लगे पेड़ तो बोल नहीं सकता तब जरूर कोई खोल के अंदर बैठा होगा। सो उन्होंने आदेश दिया ''इस पेड़ को आग लगा दी जाये''

आग लगते ही पेड़ की खोल में बैठे दुष्टबुद्धि के पिता कूदकर बाहर आ निकले। लेकिन तब तक वो काफी जल चुके थे बच नहीं सके। 

न्यायमंत्री सब कुछ समझ गए उन्होंने दुष्टबुद्धि को धर्मबुद्धि की अशर्पियाँ लौटाने का आदेश दिया और धर्मबुद्धि को उसकी अशर्पियाँ दिलाई और इतना ही नहीं उन्होंने दुष्टबुद्धि का एक हाथ काटकर देश से निकाल दिया और उसके किये गए छल कपट का दंड दिया। 

28. Kahani In Hindi - नेवला और सांप 

एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसकी एक पत्नी थी। कुछ दिनों के बाद उनके घर में एक बेटे का जन्म हुआ। वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए। गरीब होने पर भी वे दोनों उसका लालन-पालन करने में अच्छे कार्य कर रहे थे। दोनों उसका अच्छा ख्याल रखते थे। कभी उसे अकेला नहीं छोड़ते थे। 

एक दिन उसकी माँ नदी पर नहाने के लिए गयी। वह अपने पति को अपने बेटे के पास बैठा गयी। 

अचानक उस नगर के राजा की दासी वहां आई और बोली ''महाराज आपको अभी राजमहल चलना होगा आपको पूजा करवानी है। 

ब्राह्मण सोच में पड़ गया। अगर वह पूजा करवाने राजा के दरबार में जाता है तो बीटा अकेला रह जायेगा और यदि नहीं जाता तो उसे दक्षिणा नहीं मिलेगी। वह करे तो क्या करे ? 

बहुत सोचने पर उसे एक उपाय सुझा। उसके पास एक पालतू नेवला था। उसे वह अपने बेटे की रक्षा के लिए उसके पास छोड़ गया और स्वयं दासी के साथ चला गया। 

उसके जाने के कुछ देर बाद एक सांप वहां आया और उस बालक की

तरफ जा रहा था। नेवले ने सांप को देखा फिर बच्चे को देखा। नेवला बड़ा स्वामी भक्त था। स्वामी के बेटे के प्राणो की रक्षा के लिए उसने सांप पर हमला बोल दिया और उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। 

थोड़ी देर बाद बहुत सारी दक्षिणा लेकर वह ब्राह्मण भी अपने घर लोटा। नेवला उसे दरवाजे पर ही मिला। नेवले के मुँह पर खून लगा हुआ था। उसने समझा कि नेवले ने उसके बेटे को मार डाला है। बस जल्दबाजी में सोचते-सोचते ही उसने एक बड़ा पत्थर उस नेवले के ऊपर दे मारा। 

बेचारा नेवला उसी वक्त मर गया। 

अब ब्राह्मण अंदर गया। वहां उसका पुत्र बड़े ही आराम से लेटा हुआ था और उसकी चारपाई के पास एक मरा हुआ सांप पड़ा हुआ था। 

यह देखते ही वह सब कुछ समझ गया। उसे बहुत दुःख हुआ उसकी अनजाने में कि गई गलती पर। 

"लेकिन अब पछताए होता क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"

दोस्तों यह हिंदी कहानी ( KAHANI HINDI ) हमे मोरल शिक्षा के रूप में यह सीखाना चाहती है की हमे कोई भी कार्य जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। 

29. Moral Stories In Hindi - छोटा जादूगर

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हंसी और विनोद का कलनाद गूंज रहा था। में खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शरबत पिने वालो को देख रहा था। उसके गले के ऊपर से फटे कुर्ते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। में न जाने उसकी और क्यों आकृष्ट हो रहा था। उसके अभाव में भी मुझे सम्पूर्णता दिखाई दे रही थी। 

मेने पूछा :- क्योंजी तमने इसमें क्या देखा ?

वो बोला मेने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते है खिलोने पर निशाना लगाते है और तीर स नंबर भी छेदते है। मुझे खिलोनो पर निशाना लगाना अच्छा लग रहा था। मन में ही सोच रहा था जादूगर तो बड़ा निकम्मा है। लड़का कहा रहा है इससे अच्छा तो में ताश का खेल में ही दिखा सकता हूँ। उसने बड़े ही विश्वास के साथ यह बात कही उसकी वाणी में कही भी बनावट नहीं थी। 

मेने पूछा उस पर्दे में क्या है ?  क्या तुम वहां गए हो ?

लड़का बोला "नहीं में वहां नहीं जा पाया" क्योकि वहां जाने का तो टिकट लगता है। तो मेने कहा तो चलो फिर में ले के चलता हूँ। मेने मन ही मन में सोच लिया की आज यही मेरा मित्र है। उसने कहा वहां जाकर हम क्या करेंगे। 

तो मेने कहा हम वहां जाकर निशाना लगाएंगे। 

मेने उससे सहमत होकर कहा कि चलो तो फिर हम पहले शरबत पिटे है और बाद में अंदर जायेंगे। वहां पर मनुष्यो की भीड़ लगी हुयी थी। हम दोनों ने पहले शरबत पिया और उसके बाद निशाना लगाने गए। 

राह में चलते चलते मेने उससे पूछा की तुम्हारे परिवार में कौन-कोन है!

उसने कहा माँ और बाबूजी !

मेने कहा क्या आपको यहाँ आने के लिए तुम्हारे बाबूजी ने मना नहीं किया ?

उसने गंभीर स्वर में कहा बाबूजी जेल में है !

मेने कहा 'क्यों'

उसने गर्व से कहा देश के लिए जेल गए है बाबूजी !

मेने कहा और तुम्हारी माँ ?

वह बोला माँ बीमार है ?

मेने कहा और तुम यहाँ तमाशा देख रहे हो ?

उसके मुँह पर तिरस्कार जैसी हंसी फुट पड़ी !

उसने कहा तमाशा देखने नहीं तमाशा दिखाने निकला हूँ ?

कुछ पैसे ले जाऊंगा तमाशा दिखाके और माँ के लिए दवा खरीदूंगा ?

यदि आप मुझे शरबत ना पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता तो मुझे और अधिक प्रसंशा होती !

में आश्चर्य से उस तरह चौदह साल के लड़के को देखने लगा 

वो कह रहा था सर माँ बीमार है और पिताजी जेल में है तो मेने सोचा की तमाशा दिखकर क्कुह पैसे कमाकर माँ का इलाज भी करवा लूंगा और अपना पेट भी भर लूंगा। 

हम दोनों एक दूसरे की तरफ देखते हुए वहां पहुँच गए जहाँ खिलोनो को गेंद से गिराया जाता था। मेने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दे दिया। 

वह लड़का निकला पक्का निशानेबाज ! एक भी गेंद खली नहीं गई ! देखने वाले सभी व्यक्ति दांग रह गए। उसने बारह खिलोनो को बटोर लिया लेकिन एक साथ उठा नहीं पाया ज्यादा खिलोने होने की वजह से।

लड़के ने कहा बाबूजी में आपको तमाशा दिखाऊंगा बाहर चलिए ! बाहर जाते ही लड़का भाग गया ना जाने कहा गायब हो गया !

मेने मन ही मन सोचा बेटा इतना जल्दी बदल गया !

में घूमता हुआ पान की दुकान पर आ पहुंचा। मेने वहां से पान खाया और इधर उधर टहलने लगा आस पास उस लड़के को देखने का प्रयास करने लगा ! अचानक मुझे किसी ने ऊपर हिंडोले से पुकारा बाबूजी !

मेने पूछा कौन ?

उसन कहा में हूँ छोटा जादूगर !

में झील के किनारे बैठकर जलपान करने लगा। मण्डली में बाते भी कर रहा था। इतने में ही मुझे छोटा जादूगर दिखाई पड़ा ! उसने हाथ में चारखाने का खादी का झोला ले रखा था मस्तानी चाल में झूमता हुआ मुझसे कहने लगा बाबूजी आप कहे तो तमाशा दिखा दू !

मेने कहा नहीं बच्चे अभी में जलपान कर रहा हूँ ! फिर उसने जिद करते हुए कहा गाना बजाना भी होगा ! फिर मेने गुस्से में कहा नहीं मुझे नहीं देखना। 

तभी श्री मति ने कहा "दिखलाओ जी तुम तो अच्छे आये भला कुछ मन तो बहले ! में चुप हो गया क्योकि श्री मति जी की वाणी में माँ की वाणी की मिठास थी। जिसके सामने लड़के को रोका नहीं जा सकता। 

लड़के ने खेल आरम्भ किया उस दिन कार्निवाल के सभी खिलोने उसके खेल में अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बन्दर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याह हुआ। लड़के ने सब को हंसा हंसा के लोट पॉट कर दिया। 

म सोच रहा था बालक को आवश्यकता ने कितना चतुर बना दिया है। यही तो संसार है। खेल खत्म होने के बाद श्री मति ने धीरे से उसे एक रुपया दिया वह उछल पड़ा। मेने कहा ! लड़के !

छोटा जादूगर कहिये यही मेरा नाम है इसी से मेरी जीविका है। 

लड़का कुछ कहना चाहता था पर उससे पहले ही श्री मति ने लड़के से कहा तुम इस एक रूपये का क्या करोगे ?

लड़का बोला पहले तो भर पेट पकोड़ी खाऊंगा उसके बाद एक सूती कम्बल खरीदूंगा। वह नमस्कार करके चला गया और हम भी निकल गए। 

हम लोग मोटर में बैठकर निकले ! अचानक मुझे एक झोपडी के पास वह छोटा जादूगर दिखाई दिया मेने मोटर रोककर पूछा तुम यहाँ कहा!

लड़के ने कहा माँ अब इसी झोपडी में है अस्पताल वालो ने उसे निकाल दिया अब। में मोटर से उतरकर उस झोपडी के अंदर गया और देखा एक स्त्री चित्तड़ो से लिपटी हुई काँप रही थी। लड़के की आँखों से आंसू निकल आये। 

में कुछ देर वहां रुका और वहां से बाद में निकल गया। 

रात के दस बजे हुए थे। लड़का खेल दिखा रहा था। खेल अच्छी तरह से दिकः रहा था पर मेने महसूस किया की लड़के की वाणी में प्रसंशा नहीं थी। वह जब औरो को हंसाने की चेष्टा कर रहा था तब स्वयं कांप रहा था। में सब आश्चर्य के साथ देख रहा था। खेल समाप्त होने के बाद लड़के ने पैसे बटोर कर बीड़ में मुझे देखा। वह मुझे देखते ही क्षण भर में ही स्पूर्ति दिखाने लगा। 

मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा 

आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं ?

उसने कहा माँ ने कहा है की आज जल्दी चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है। मेने कहा तब भी तुम खेल दिखाने चले आये। मेने क्रोध से कहा। उसके चेहरे पर दुःख की छाया जलक रही थी। अब में ज्यादा कुछ नहीं बोल पा रहा था उस लड़के को क्योकि उसके चेहरे पर दुःख प्रकट हो रहा था। 

जल्दी से लड़का और में मोटर से झोपडी में पहुंचे। जादूगर झोपडी में माँ-माँ कहते हुए दौड़ता हुआ गया। में उसके पीछे गया मेने देखा उस स्त्री के मुँह से सिर्फ बे निकलकर रह गया। जादूगर अपनी माँ से लिपटकर रोने लगा। बिना किसी दया के भी मेरी आँखों से आंसू गिरने लगे। 

मेने जैसे तैसे करके उस लड़के को उसके बाबूजी से मिलाया और वहां से हमेशा के लिए चला आया। उम्मीद है छोटा जादूगर दोबारा मिलेगा। 

Moral - यदि आपके पास कोई भी बच्चा आये और खाने के लिए कुछ मांगे तो उसे कुछ खिला दीजियेगा क्योकि उनके घर में हालात छोटे जादूगर जैसे हो सकते है। बच्चो को खाना खिलाना तो भगवान की सेवा करने जैसा है।

30. Best Stories In Hindi - लव और कुश 

लव और कुश बड़े होनहार बालक थे। उनका जन्म तमसा नदी के किनारे वाल्मीकि आश्रम में हुआ था। वे अपनी माता सीता के साथ इसी आश्रम में रहते थे। बाल्यकाल में स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने उनका पालन-पोषण किया तथा उन्हें सम्पूर्ण विद्याओ का ज्ञान दिया। 

लव-कुश में क्षत्रिय के सभी गुण मौजूद थे। वे शस्त्र चलाना सिख गए थे। बाण चलाने में तो वो बहुत निपुण थे। उनका निशाना अचूक था वे बड़े वीर और साहसी थे। 

गुरु वाल्मीकि उनको नित्यप्रति रामायण की कथा सुनाया करते थे जिसकी वजह से दोनों बालक रामायण को कंठस्थ कर चुके थे। 

रामायण की कथा का गान करना,गुरु की आज्ञा का पालन करना और मुनि कुमारो के साथ खेलना उनका नित्यकर्म था। 

एक दिन सीता ने आश्रम के बाहर कुछ शोर सुना तो वो दौड़ी हुयी उस तरफ गयी। सीता को रस्ते में ही कुश मिल गया। कुश ने सीता को बताया की आश्रम में एक सुंदर घोडा आया है। उसको हमने पकड़ लिया है और एक पेड़ से बांध दिया है। 

घोडा किसका घोडा ? यहाँ कैसे आ गया ? चल में भी देख लू। सीता यह सब कहती हुई कुश के साथ उस स्थान पर पहुंची। घोडा सोने के आभूषणों से सज्जित था। उसकी गर्दन में एक स्वर्णपत्र लटक रहा था। 

स्वर्णपत्र पर अंकित था "यह राजा रामचंद्र के अश्वमेध यज्ञ का अश्व है "

यह देखकर सीता घबरा गई और बोली तुम इसे शीघ्र छोड़ दो। 

लव ने कहा हम इसे नहीं छोड़ेंगे यह बहुत सुन्दर है। 

सीता ने कहा बेटे तुम नहीं जानते इसके पीछे सेना होगी। 

कुश बोला कोई भी क्यों ना हो हम इसे नहीं छोड़ेंगे इसे हमने पकड़ा है अब यह हमारा है। 

सीता ने भी दिखाते हुए कहा की अगर तुमने इसे नहीं छोड़ा तो युद्ध होगा। 

हम युद्ध से नहीं डरते लव ने निडर होकर उत्तर दिया। 

हम पुरषार्थी है। आपने ही तो हमे शिक्षा दी थी पुरषार्थी युद्ध से नहीं डरते। फिर आप हमे भय क्यों दिखा रही है। कुश ने लव के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा। 

सीता धर्म संकट में पड़ गई। वह महर्षि वाल्मीकिजी को भुलाने चली गयी क्या पिता पुत्र में युद्ध होगा सीता अज्ञात अनर्थ की आशंका से सिहर उठी। 

सीता के जाने के बाद एक सैनिक वहां आया। वह लव से बोला "बालक यहाँ अश्वमेध का अश्व तो नहीं आया ना ?

कुश ने उत्तर दिया देखते नहीं वह पेड़ से क्या बंधा है ? सैनिक घोड़े की तरफ बड़ा। लव ने उसे ललकारा घोडा नहीं खोलना। इसे हमने पकड़ लिया है अब यह हमारा है। 

कैसी बाते करते हो बालको यह भी कोई खेल है ? अरे ! यह राजा राम के अश्वमेध यज्ञ का अश्व है। इसे वही पकड़ सकता है जो राम से युद्ध कर सकता है। 

तुरंत कुश ने उत्तर दिया "हमे भय दिखाता है रे" ?

सैनिक को बालको की बाते बालहठ लगी। वह घोडा खोलने के लिए आगे बढ़ा। 

कुश ने कहा देखो सैनिक हम नहीं चाहते कि तुम हमारे बाणों से मारे जाओ। चुपचाप लोट जाओ। पर सैनिक नहीं माना। 

लव कुश ने युद्ध के लिए ललकारा। सैनिक ने लव-कुश के ऊपर एक बाण छोड़ा। लव ने सैनिक के बाण के दो टुकड़े कर दिए। दोनों और से बाण चलने लगे। अंत में लव-कुश ने सैनिक को हरा दिया। 

उन्होंने सैनिक के दोनों हाथ पीछे की और बांध दिए। फिर उससे कहा जाकर अपने सेनापति से कहो कि सेना लेकर लोट जाये और किसी दूसरे घोड़े का  प्रबंध कर ले। सैनिक चला गया। 

सामने से उन्हें एक विशाल सेना आती हुयी दिखाई दी। लव और कुश सेना को रोकने के लिए चल दिए। आगे आगे रथ पर सेनानायक सवार था। राम ने लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु को अश्व की रक्षा का भार सौंपा था। वह इस सेना का नायक था। 

लव-कुश को देखकर चंद्रकेतु रथ से उत्तर कर उनके पास गया और बोला तुम इस अष्व को शीघ्र छोड़ दो अथवा मेरे साथ युद्ध करो। 

वीर ! हम वाल्मीकि के शिष्य है हम कायर नहीं है। हम यु ही अश्व को नहीं छोड़ेंगे। हमसे युद्ध करो और छुड़ा लो। साडी सेना मूर्तिवत हो गयी फिर लक्ष्मण सेना लेकर आये और युद्ध करने लगे। इधर सीता महर्षि वाल्मीकि के पास पहुंचकर सारी घटना बता रही थी कि एक तपस्वी आया और हाँपते हुए बोला "महर्षि शीघ्रता कीजिये" 

लव-कुश के बाणो से लक्ष्मण मूर्छित हो गए है। 

सीता यह सुनते ही व्याकुल हो उठी। महर्षि वाल्मीकि ने मुस्कराते हुए कहा बेटी सीता दुखी मत हो जो कुछ हो रहा है वो शुभ ही है। 

उधर अयोध्या से कुछ दुरी पर विशाल यज्ञ शाला बनी थी। आवश्यक तैयारियां चल रही थी। राम प्रसन्न थे कि अश्वमेध का अश्व बिना किसी रोक टोक के आगे बढ़ रहा था। इतने में ही एक सैनिक घबराता हुआ यज्ञ शाला में आ पहुंचा। 

राम को सादर सिर झुकाकर बोला 

महाराज सारे देश का भर्मण करने के बाद अश्व आयोध्या लोट रहा था तब वाल्मीकि आश्रम के लव और कुश बालको ने उसे पकड़ लिया। हमने उन्हें समझाया लेकिन वे नहीं माने। आखिर युद्ध करना पड़ा। वे साधारण बालक नहीं है महाराज उनके बाणो से हमारे सैनिक और लक्ष्मण मूर्छित हो गए है। 

यह सुनते ही श्री राम वाल्मीकि आश्रम पहुंचे। वे बालको से बोले मुनि बालको मेरे अश्व को शीघ्र छोड़ दो। पर बालक कहाँ मानने वाले थे। राम से भी युद्ध करने को तैयार हो गए। इतने में ही सीता महर्षि वाल्मीकि को लेकर वहां पहुंची। राम को सामने देखकर वाल्मीकि जी ने कहा लव-कुश तुम मुझसे से सदैव अपने पिता के बारे में पूछते थे ना यही तुम्हारे पिता है अयोध्या के राजा राम। यह सुनकर राजा राम ने लव कुश को बाहों में भर लिया। मिलान के इस अधभुत दृश्य को देखकर वाल्मीकि जी की आँखों से आंसू बह निकले। 

हमें उम्मीद है की आपको हमारी Moral Stories in Hindi पढ़ कर जरूर मज़ा आया होगा। यह Short Stories, Hindi Kahaniyan न केवल kids को पढ़ने में अच्छी लगती है बल्कि यह बड़े लोगों के मनोरंजन का साधन भी बनती है और हमें बचपन की याद दिलाती है। हम बच्चों के लिए ऐसी ही नई नैतिक कहानियाँ यहाँ पर डालते रहेंगे। यदि आपको हमारी नैतिक कहानियाँ पसंद आयी हो तो आप हमकों इसके बारे में नीचे comment भी कर सकते है।

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